Archive for ડિસેમ્બર, 2017

फासला इतना भी कॅन्हा था


फासला इतना भी कॅन्हा था, घर तो तेरा भी इसी शहर मे था,

महोब्बत कम थी क्या बताओ, इरादा तो नेक था!

बाहर से कुछ तूटा दिखाई नही देता, एक तूही हमारा राज़दार था!

-दर्दिल (महेश चावडा)

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