जब तू जाता हे


डाली डाली बिखर जाता हूँ, जब तू जाता हे|
पत्ता पत्ता सुख जाता हूँ, जब तू जाता हे|

कुछ दीनो की बात हे, ये तू कहता हे|
सालो-साल तरस जाता हूँ, जब तू जाता हे|

घर, चोराहा, बस्ती, शहर, रास्ते…
गली गली ठहर जाता हूँ, जब तू जाता हे|

ख़याल रखना अपना, ये तू कहता हे|
तेरे इश्क़ का मरीज़!…
बिन मौत मर जाता हूँ, जब तू जाता हे|

-दर्दिल (महेश चावडा)

Advertisements

हाँ पुकारो मुझे! मे आउगाँ


हाँ पुकारो मुझे! मे आउगाँ. और क्यूँ ना आउँ? जब मेने तुंजे पूकारा था तो तू आया,
आया ओर मेरे साथ खेला, मेरे साथ हसा और बड़ाभी हुवा|
और तुम तब आए जब मे हसना भूल गया था, तुमने फिरसे मुझे हसाया था|
क्यूँ ना आउँ? जब मे बचपन भूल गया था तो तुम्हारी नन्ही सी मुस्कान ने मुझे…
फिर बच्चा बना दिया था|

हाँ पुकारो मुझे! पुकारो ही क्यों? पूछो जो पूछना हे.
तुम्हारे कुछ सवाल ऐसे, जिनके जवाब तब नही थे पर आज हे!
तुम्हारे उन सवालो मे मुझे मेरेभी जवाब मिलजाते हे!

पूछो और मांगभी लो मुजसे. तुम्हारी उन माँगो मे कुछ मेरी भी माँगे पूरी होती हे,
जो कभी अधूरी सी रह्गयि थी|

तुम मुझे पूकार सकते हो! कन्हि भी कभी भी. तुम्हारी हर पूकार मुझे इस मुर्दो के
स्मशान से वापस जीवन की लहराती वादियों मे ले जाती हे.
अगर तुम्हे लगे के मे दूर निकलता जाता हूँ इनमे, तो थोड़ी ज़ोर से आवाज़ देना,
में लॉट के आउगाँ, और क्यों ना आउँ? मुझे आना हे. मुझे आना ही हे|

अपनी बेटी को -दर्दिल (महेश चावडा)

उजाले को पाने के लिए, तुम्हारी अंधेरों से निकलने की तैयारी चाहिए


रोशनी ही ज़रूरी नही, दिशा तो आवाज़ से भी मिल जाती है, तुम्हारी सुनने की तैयारी चाहिए | ज़रा बाहर आओ, ना जाने कितनी आवाज़े बुला रही है तुम्हे. कोई एकभि सच्ची आवाज़ ठिकसे सुन लोगे तो रास्ते खुलजाएँगे…ऐसा एहसास मिलजाएगा जैसे बीच समंदर कोई किनारा मिलजाए.

इटनाभि कठिन नही समजना जीवन को. सोचो क्यूंकी बुध्धि है, देखो क्योंकि आँखे है. सुनो क्योंकि कान है. चलो और चलते जाओ… ये रास्ते ओर पैर इसी बात को चिल्ला के कहते है|

उजाले को पाने के लिए, तुम्हारी अंधेरों से निकलने की तैयारी चाहिए.

जुकोगे तो पाओगे


जुकोगे तो पाओगे…

जुकनेसे तुम ओर गहेरे उतर सकते हो. तूफान को जेल पाओगे तभी जब जुकोगे. जुकना तुम्हे ठहराव की ओर लेजाएगा. क्योंकि ठहराव ही तुम्हे अनुभव का एहसास देगा.

ज़रूरी नही के तुम दोडते रहो. दोडो फिर ठहरो, फिर चलो. ठहरो जेसे पेड़ ठहरा हुवा हे जेसे कभी चलाही ना था. दोडो जेसे हवाएँ चलती हे, जेसे कभी रुकीही न थी.

क्योंकि ठहराव -तुम्हे आनंद देगा. जो कभी रुका ही नही उसे एहसास भी नही| तुम दोडते हो क्योंकि तुम्हे पहुँचना हे कहीं! पर पहुँचनेमे आनंद नही हे, आनंद तो सफ़र में हे| ठहरो गे तो उस आनंद को पहचान पाओगे|

જીવનને સમજવા ની સમજદારી ખૂટે છે


જીવનને સમજવા ની સમજદારી ખૂટે છે,
જે તારુ નથી ઍ પામવા,ને તૂ કેમ તૂટે છે?

પરબ ની જન્ખના મા તૂ શુકામ રાચે છે?
ખોબો છે, ઍ પીજા ને! તરશ તો તોય છીપે !

ના ભટક આમ તેમ તુ, સમય થોડો બાકી છે,
સમાયજા માયલા મા તુ, જવાબ તો ત્યાંજ મળે છે!

-દર્દિલ

फासला इतना भी कॅन्हा था


फासला इतना भी कॅन्हा था, घर तो तेरा भी इसी शहर मे था,

महोब्बत कम थी क्या बताओ, इरादा तो नेक था!

बाहर से कुछ तूटा दिखाई नही देता, एक तूही हमारा राज़दार था!

-दर्दिल (महेश चावडा)

इसी लिए ज़िंदा हे हम आज भी


इसी लिए ज़िंदा हे हम आज भी वो ख़याल से,
कन्हि ये इल्ज़ाम ना लगा दे दुनिया वाले,
के महोब्बत मे मरने वाले ख़ुदग़र्ज़ होते हे!

उनका दिल आज भि मेरे पास हे,
के महोब्बत से जुड़े दो दिल, महफूज़ होते हे!
कहां दिखते हे वो हसीन सितम,
ऐसे राज़ तो कब्र मे दफ़न होते हे!

 

-Dardil

Advertisements